सोमवार, 21 जुलाई 2014

मजबूत एवं प्रभावी लोकतंत्र के लिए पत्रकारों को अपनी महती भूमिका में आना होगा: व्यास

चित्तौड़गढ़ 20 जुलाई। जर्नलिस्ट एसोसिएशन आॅफ राजस्थान चित्तौड़ जिला ईकाई की ओर से डूंगला में जिला सम्मेलन सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं एसोसिएशन (जार) के प्रान्तीय विधि सलाहकार एडवोकेट प्रहलाद राय व्यास ने कहा कि पत्रकार को आज आम जनता की दुःख एवं तकलीफों को सत्ता, प्रशासन तक पहुंचाना होगा और सरकारों की एवं प्रशासन की योजना एवं क्रियाकलापों को जनता के बीच में लाना होगा। ताकि मजबूत लोकतंत्र के लिए प्रभावी जनमत तैयार किया जा सके।
व्यास ने कहा कि आज कार्यपालिका, न्याय पालिका, विधायिका एवं कथित एनजीओ व सामाजिक सांस्कृतिक संगठन अपनी उचित भूमिका से हटकर गिरावट के दौर में है। आज सभी संस्थाओं में पारदर्शिता, जवाबदेही व सुशासन की प्रतिबद्धता कम हुई है। क्योंकि समाज में माॅडल हिरो आज कोई बचा ही नहीं है। कर्म की दार्शिकता का लगता है आज समय ही समाप्त होता जा रहा है। समाज में जो आपा-धापी है, भ्रष्टाचार उसका मूल कारण है समाज के गिरते नैतिक मूल्य। पत्रकारिता का आज तकाजा है कि वे काॅर्पोरेट इण्डिया के बजाय रियल इण्डिया या असली भारत के लिए अपनी धारदार कलम का उपयोग करें। पत्रकार ही वो शक्स होता है जो बिना किसी भय एवं पक्षपात के यदि कलम चलाये तो दुनिया की तकदीर एवं तस्वीर बदल सकता है।
एडवोकेट व्यास ने कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि वे राजस्थान में पत्रकारों की क्षमताओं में वृद्धि करते हुए पत्रकारों को नवीनतम तकनीकों ने अवगत कराने के लिए प्रत्येक जिले में कम से कम एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करेंगे ताकि पत्रकार साथी अपनी ऊर्जा एवं क्षमता का अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खात्में में उपयोग कर सके। कार्यक्रम में चित्तौड़ जिले के सांसद श्री सी.पी. जोशी मुख्य अतिथि थे एवं अध्यक्षता जिला संयोजक श्री गोविन्द त्रिपाठी ने की। जिलेभर से 125 से ज्यादा पत्रकार उक्त सम्मेलन में दो सत्रों में उपस्थित रहे।

शुक्रवार, 27 जून 2014

भारत में बाल श्रम न केवल अभिशाप, कलंक भी - व्यास

आजाद भारत में 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ। संविधान की मंशा के अनुसार देश में ऐसे गणराज्य की कल्पना की गई थी जो समाजवादी गणराज्य की अवधारणा पर खरा उतरता हो। परन्तु 1990 के बाद देश ने ऐसी अर्थव्यवस्था को स्वीकार किया जिसने समता, समानता, सहिष्णुता एवं सहअस्तित्व की धारणा को कमजोर कर दिया। 
शोषणविहीन न्यायपूर्ण समाज की रचना भारत के संविधान की आत्मा रही है। परन्तु देश में जिस शासन व्यवस्था को हम स्वीकार कर रहे है उस व्यवस्था में न केवल आर्थिक शोषण हो रहा है साथ ही राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक स्तर पर भी बहुसंख्यक समाज का निर्मम शोषण हो रहा है। वंचित वर्ग पूरी तरह वंचित ही है। इसके परिणाम स्वरूप बालश्रम निकल कर आया है। आज बंधआ मजदूरी, बालश्रम, ठेका मजदूर, सस्ता बुद्धीजीवी भी तकनीकी रूप से कुशल श्रमिक बनकर रह गया है। मोटे अनुमान के अनुसार देश में 6-7 करोड़ बालक है जो बालश्रमिक है। जिनके लिए शिक्षा, प्रशिक्षण, उचित देखभाल, संरक्षण, सुरक्षा केवल कागजी शब्द है। जब देश का बचपन कठोर श्रम कर के परिवार का पालन-पोषण करता हो तो कैसे अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे बच्चे के मन पर अस्थाई आगात नहीं होंगे। आज देश का बचपन इन्ही मानसिक आघातों का शिकार है। आज बालश्रमिकों की तस्करी एवं यौनशोषण की बातें भी उभर कर सामने आ रही है। बच्चों के साथ में हिंसा एक नया रूप लेती जा रही है। आज दुनिया में बच्चों को आंतकवादी, माओवादी, चरमपंथी धार्मिक कठमुल्लाह बनाने का पक्का इंतजाम किया जा रहा है। ऐसे समय में हमें यह तय करना पडेगा कि यदि हम देश में शोषणविहीन न्यायपूर्ण समाज की रचना करना चाहते है तो निश्चित रूप से जिन परिवारों में बच्चें श्रम करते हो उन परिवारों मंें से कम से कम एक व्यक्ति को 280 दिन स्थाई रोजगार उपलब्ध कराना होगा जो न्यूनतम मजदूरी से कम देय नहीं होगा। साथ ही श्रम विभाग द्वारा संचालित तथाकथित बालश्रम विद्यालय की समीक्षा कराते हुए नये सीरे से देशभर में उच्च गुणवत्ता वाले आवासीय बालश्रम विद्यालय चालू करने पडेंगे जो नवोदय विद्यालय की तर्ज पर हो सकते है। आज भी श्रम विभाग या बाल अधिकार संरक्षण आयोग की जिम्मेदारी बनती है कि वे बच्चों के शोषण व अकल्याणकारी स्थितियों को आमुलचूल परिवर्तन करें। केवल अंतर्राष्ट्रीय चार्टर पर हस्ताक्षर कर देने से भारत सरकार अपनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकती। देश की न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका, मीड़िया एवं प्रबुद्ध समाज संगठनों की जिम्मेदारी बनती है कि वह देश में अन्यायपूर्ण व्यवस्था के खात्मे के लिए संवेदनशील होकर आचरण करें। केवल बयानबाजी ना करेें। आज सरकारें बदलने से यदि देश के हालात नहीं बदलते है तो जनता के साथ में यह एक राष्ट्रीय स्तर का धोखा होगा और ऐसे धोखेबाज लोगों के साथ क्या न्यायपूर्ण व्यवहार किया जा रहा है? यह देश का जनमत ही तय करेगा। 
मेरी स्पष्ट धारणा है कि यदि कोई भी सरकार दो साल साथ संतोष जनक कार्य न कर पाये तो देश की आम जनता को जनमत संग्रह के माध्यम से सरकार के क्रियाकलापों पर ठोस एवं प्रभावी कार्यवाही का अधिकार मिलना चाहिए। आज केवल सरकारें चुनाव जीत जाने के बाद में वे मान के चलती है कि देश के आम आदमी की अब कोई भूमिका ही नहीं बचती है। सूचना का अधिकार  कानून व्यक्ति को देश के हालात बदलने के लिए एक औजार भी उपलब्ध करवाता है। आवश्यकता होने पर भ्रष्टाचार व महंगाई के खिलाफ लड़ने का हथियार भी उपलब्ध कराता है। बेशर्ते देश की जनता ऐसे हथियार एवं औजार का इस्तेमान करना सीख जाये। इस हथियार एवं औजार को चलाने का प्रशिक्षण भी मैं लम्बे समय से देता आ रहा हूं तो मेरा अनुभव यह बोलता है कि सूचना का अधिकार कानून भ्रष्टाचार एवं महंगाई जैसे व्यक्तियों से लड़ने में ब्रह्मास्त्र तो नहीं हो सकता है परन्तु कारगर हथियार एवं औजार हो सकता है। 

मंगलवार, 11 मार्च 2014

आगामी लोकसभा चुनाव देश की दशा एवं दिशा तय करेंगे - व्यास

देशभर में 12 अप्रेल 2014 से 12 मई 2014 तक लोकसभा के एवं तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव होना निश्चित हुआ है। देश का 81 करोड़ से ज्यादा मतदाता आगामी चुनाव में मतदान करेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश का 10 करोड़ से ज्यादा मतदाता वो है जो पहली बार मतदान करेगा। उसके मन में उठ रहे ज्यार भाटे को समझना प्रत्येक राजनीतिक दल एवं नेता के लिए चुनौतिपूर्ण कार्य है। चैखंभे राज की परिकल्पना रखने वाले डाॅ. राममनोहर लोहिया जी ने आजाद भारत में चैखंभा राज की मजबूती की कल्पना की थी। भारतीय लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं स्वतंत्र निर्भिक पत्रकारिता एवं प्रभावी जनसमूह की भी कल्पना की गई है। परन्तु आज विधायिका द्वारा बनाये गये कानून या तो बेअसर हो रहे है या लागू करने वाली एंजेसिया कानूनों को लागू करते समय अपनी इच्छा व इनिच्छा को ध्यान में रखके फैसले करती है। जिसके कारण जिन उद्देश्यों से कानून बनाये गये वो कानून उन उद्देश्यों को प्राप्ति नही कर पाता जिसके लिए उन्हे बनाया गया। आज भी कई लोकहित के कानून ठीक तरह से लागू नहीं हो पा रहे है। या जिन एंजेसियों को कानून लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है वह सुविधा एवं असुविधा के आधार पर या व्यक्तिगत मान्यताओं से प्रभावी होकर कानूनों को निष्प्रभावी बना रहे है। कार्यपालिका या सरकार केवल वोट बैंक को कैसे लामबंद किया जा सकता है इसकों ध्यान में रखकर कानूनों का निर्माण एवं फैसले किये जा रहे है। सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में सरकारे वो निर्णय भी कर रही है जो विकास के बजाय विनाश के बीज तैयार कर रहे है। न्यायपालिका लोगों को न्याय नहीं दे रही है केवल निर्णय दे रही है। वो प्रत्येक निर्णय जरूरी नहीं है कि न्यायपूर्ण हो। 
 आज की आवश्यकता यह है कि निर्णय न्यायपूर्ण हो और कानूनों की सही व्याख्या करते हो। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद आजादी के पहले की गई थी। परन्तु आज हिन्दुस्तान का मीडिया 81 हजार करोड़ का एक व्यापार बन कर रह गया है जिसमें हर निवेशक केवल आर्थिक लाभ ही ढ़ूंढता है। पत्रकारिता से संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है और नकारात्मक एवं पीत पत्रकारिता प्रभावी होती जा रही है। आज पेड न्यूज का व्यापार भी तेजी से फलता फूलता जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता काॅर्पोरेट इण्डिया का पेरोकार होती जा रहा है। जबकि उसे असली भारत के प्रति जवाबदेह, पारदर्शी होना चाहिए। आज आवश्यकता है समाज के शिक्षित और प्रशिक्षित जवाबदेह जनसमूह राजनीति, समाज व्यवस्था एवं सामाजिक ताने-बाने पर अपना नियंत्रण स्थापित करें अन्यथा देश में क्रांति हो या ना हो अराजकता तो हो ही सकती है। 
 जब तक समाज में नीति, नेता व नियत ठीक नहीं होगी तब तक आम आदमी के जीवन में कोई सूर्योदय नहीं हो पायेगा। आगामी चुनाव निश्चित रूप से नीति एवं नेता की अग्नि परीक्षा होगी कि वह जनहित में काम करते है या स्वहित में काम करते है। 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही संभव है: व्यास

15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजी शासन की दासता से मुक्त हुआ था। आजादी के आन्दोलन से पूर्व स्वतंत्रता सैनानियों का एक मात्र लक्ष्य था कि भारत को अंग्रेजी हितों की दासता से मुक्त कराकर स्वराज्य कायम करना। इसके लिए शहीद-ए-आजम भगतसिंह एवं उन्हीं के पात के गर्म दल के नेता एनकेन प्रकारेण देश को न केवल अंग्रेजों से आजादी दिलाना चाहते थे, बल्कि सही मायने में देश को आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व नागरिक आजादी भी दिलाने चाहते थे। इसके विपरित विचारधारा रखने वाले महात्मा गांधी एवं उनके अनुयायी भी देश को रामराज्य की कल्पना के आधार पर देश को खड़ा करने का सपना देखते थे।
कहा तो तय था चीराग हर घर-घर के लिए,
आज चीराग नहीं मयस्सर पूरे शहर के लिए,
    ठीक यह उक्ति आजाद भारत में सही साबित हुई। केवल भारत के नागरिकों को राजनीतिक आजादी हासिल हुई थी, परन्तु सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचा हमें आज भी आजादी महसूस नहीं करने देता। डॉ. राममनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण आजाद भारत के वो राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने देश के आम आदमी को न केवल सामाजिक न्याय दिलाने की लडाई शुरू की थी, बल्कि देश के आम आदमी को मुद्दों के आधार पर राजनीति करना सिखाया। 1967 में डॉ. लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन व 1975 की इमरजेन्सी के बाद श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इंदिरा गांधी की तानाशाही से मुक्ति दिलाने के बाद जनता पार्टी का उदय 1988 के बाद श्री विश्वनाथ प्रतापसिंह के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरूद्ध राजीव गांधी की 410 सीटों वाली सरकार को उखाड़ फैकने का श्रेय श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को जाता है। श्री विश्वनाथ प्रतापसिंह ने रक्षा सौदों में दलाली जैसे मुद्धों को जनआन्दोलन का मुद्धा बनाया और आम आदमी को उदवेलित किया। जिसके परिणाम स्वरूप राजीव गांधी सरकार का पतन हुआ।
    अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में जनलोकपाल बिल को लेकर जो आन्दोलन हुआ। इस आन्दोलन को राजनीतिक दलों ने एवं नेताओं ने सिविल सोसायटी के लोगों के नाजायज हस्तक्षेप के रूप में लिया। सोसायटी के नेताओं ने बार-बार अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल व बाबा रामदेव को लल्कारा कि हम निर्वाचित प्रतिनिधि है, हमारे मामले में बेजाहस्तक्षेप संविधान विरूद्ध होगा। जन लोकपाल कानून बनाना है तो चुनाव लड़ के विधायका में आओं। अरविन्द केजरीवाल व साथियों ने इस चुनौति को स्वीकार किया और उन्होने माना कि बिना राजनीति में उतरे सरकारे तो बदली जा सकती है पर समाज में आमूलचूल परिवर्तन संभव नहीं है। आम आदमी पार्टी ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन के औजार के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया जिसके परिणाम स्वरूप पिछले एक साल में आम आदमी के हक में एवं उसकी सुरक्षा के लिए जो आन्दोलन हुए उसके परिणाम स्वरूप आज दिल्ली में सरकार आम आदमी की बनी है बल्कि अब पूरे हिन्दुस्तान की राजनीति का एजेन्डा आम आदमी पार्टी तय कर रही है। आम आदमी के हित में जो जन आन्दोलन चला महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई-भतिजावाद, सरकारी साधनों का अपव्यय एवं दुरविनियोग जैसे मामले रहे आज पूरे हिन्दुस्तान में सादगी एवं पारदर्शिता जवाबदेही ने जनता के मन को न केवल उदवेलित किया है बल्कि आम आदमी के हितों की सुरक्षा करने वाली सरकार की कल्पना भी देश में वो कर रहे है। इस प्रकार केवल जन आन्दोलन से ही आम आदमी के हालात में आमूलचूल परिवर्तन संभव है।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

विधि संसद ही नहीं बनाती है बल्कि प्रकति एवं ईश्वर भी बनाते है. व्यास

विधि शब्द अपने आप में ही विधाता से जुड़ा हुआ शब्द लगता है। आध्यात्मिक जगत में विधि के विधान का आशय विधाता द्वारा बनाये हुए कानून से है। जीवन एवं मृत्यु विधाता के द्वारा बनाया हुआ कानून है या विधि का ही विधान कह सकते है। सामान्य रूप से विधाता का कानून, प्रकृति का कानून, जीव-जगत का कानून एवं समाज का कानून। आज कानून का अर्थ या विधि का अर्थ राज्य द्वारा निर्मित विधि से आज पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। राजनीति आज समाज का अनिवार्य अंग हो गया है। समाज का प्रत्येक जीव कानूनो द्वारा संचालित है। प्रकृति का भी अपना विधान है। प्रकृति अपने ही विधान से संचालित होती है। जल, वायु, आकाश, पृथ्वी और अग्नि भी प्रकृति के विधान से ही संचालित होती है। हजारो सालो से ये पांचो तत्व प्रकृति के विधान से ही संचालित होते है। भारतीय समाज में प्रत्येक जीव को इन पंचतत्वों का पूतला ही माना जाता है। जीवन से अंत तक प्रत्येक जीव इन्ही में ही जीते है और मरते हे। प्रकृति के साथ मनुष्य ने प्रकृति का विधान न जानने के कारण संघर्ष भी किया था।
परन्तु जैसे-जैसे मनुष्य जाति में प्रकृति के विधानोको समझना शुरू किया वैसे-वैसे उसने संघर्ष करने की बजाय समन्वय करना शुरू कर दिया। उसी का परिणाम है कि मनुष्य ने प्रकृति में जो शक्तिया है उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिये भी किया है। पर समाज के कुछ लोगों ने प्रकृति के विधान का रहस्य खोजने के बाद दुरूपयोग भी किया है। परमाणु से परमाणु बंब भी बनाया जा सकता है और परमाणु से अथाह उर्जा भी पैदा की जा सकती है। मनुष्य जाति के कुछ लोगों ने लोभ और लालच के कारण प्रकृति के साधनो का निर्मम दोहन किया जिसके परिणाम स्वरूप प्रकृति ने भी अपने विधान के अनुसार मनुष्य जाति को ही नही दूसरे जीवो को भी अपनी प्रतिक्रिया से प्रभावित किया है। भूकंप, बाढ़, तूफान, ज्वालामुखी ये सब प्रकृति के विधान को न मानने के कारण ही प्रकृति का विद्रोह है।
आज समाज में भी विधि के शासन के नाम पर दुनिया भर में सरकारे नागरिको के लिये विधि का निर्माण करती है। विधि का उदेश्य समाज के आचरण को नियमित करना है। अधिकार एवं दायित्वों के लिये स्पष्ट व्याख्या करना भी है साथ ही समाज में हो रहे अनैकतिक कार्य या लोकनीति के विरूद्ध होने वाले कार्यो को अपराध घोषित करके अपराधियों में भय पैदा करना भी अपराध विधि का उदेश्य है।संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1945 से लेकर आज तक अपने चार्टर के माध्यम से या अपने विभिन्न अनुसांगिक संगठनो के माध्यम से दुनिया के राज्यो को व नागरिको को यह बताने का प्रयास किया कि बिना शांति के समाज का विकास संभव नहीं है परन्तु शांति के लिये सहअस्तित्व एवं न्यायपूर्ण दृष्टिकोण ही नहीं आचरण को जिंदा करना भी जरूरी है। न्यायपूर्ण आचरण न होने के कारण ही आज समाज में अन्याय को ही न्याय मान लिया गया है। आज वक्त आ गया है न्यायपूर्ण समाज की रचना के लिये केवल विचार ही व्यक्त ना करे बल्कि न्यायपूर्ण आचरण भी करे तभी दुनिया में न्यायपूर्ण समाज की रचना संभव हो पायेगी। न्यायपूर्ण समाज में ही शांति, सदभाव, मैत्री, सहअस्तित्व कायम हो पाता है।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

देश की विधायिका क्या अपराधियों से मुक्त होने के लिए तैयार है ?-व्यास

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भारत सरकार आज देश की संसद में बैठे 162 दागी व्यक्तियों एवं देश की विभिन्न विधानसभाओं में बैठे 3000 हजार से ज्यादा दागी विधायिकों को ऐन-केन प्रकारेण चुनाव लड़ने के अधिकारों से वंचित नहीं करना चाहती है। सरकार ने आनन-फानन में अध्यादेश का मसोदा तैयार किया और केबिनेट से स्वीकृति हेतु पे्रषित किया परन्तु देश के विवेकशील, निःष्पक्ष एवं प्रतिभावान राष्ट्रपति महोदय से सरकार से जानना चाहा कि ‘‘वह क्यूं जल्दबाजी में जरिया अध्यादेश अपराधियों को बचाने पर आमदा है। क्यों कि देश के उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट उल्लेख किया कि जिस जन प्रतिनिधि को किसी भी अदालत में 2 वर्ष से ज्यादा कारावास की सजा सुना दी है, वह व्यक्ति तत्काल प्रभाव से चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य हो जायेगा और अपील कर देने के बाद भी उसको अयोग्यता से नहीं बताया जा सकेगा। देश की संसद में बैठे कुछ लोग किसी भी कीमत पर विधायिका को शायद अपराध मुक्त नहीं देखना चाहते है। भारत सरकार भी इस कृत्य के लिए कोई कम जिम्मेदार नहीं है। आज ही उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में राईट टू रिजेक्ट को मतदाता का महत्वपूर्ण अधिकार के रूप में मान्यता दी है। परन्तु देश के राजनैतिक दल, नेता किसी भी कीमत पर चुनाव सुधारों को लागु करने के प्रति ईमानदार नहीं है। देश की आम जनता हो ही तय करना है कि वे राईट टू रिजेक्ट जैसे ब्रह्यास्त्र का इस्तेमाल करते हुए अपराधी उम्मीदवारों को बहुमत से रिजेक्ट करें। मेरी मान्यता यह है कि 16.33 प्रतिशत वेध मतों का यदि राईट टू रिजेक्ट के पक्ष में वोट पड़ते है तो राईट टू रिजेक्ट जैसे मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए आवश्यका होने पर जनमत संग्रह भी करना चाहिए। आज पुरी दुनिया में पूंजीवादी, निरंकुश अर्थव्यवस्था ने दुनिया के आम आदमी का जीवन को नरक बना दिया है। आज व्यक्ति व्यक्तिवादी हो गया है जो केवल अपने हितों को ही सुरक्षित करने पर आमदा है। केवल व्यवस्था परिवर्तन से ही सामाजिक हितों की सुरक्षा संभव है। आज सामाजिक हितों की सुरक्षा की बात करना नितांत मूर्खतापूर्ण कार्य माना जाता है। वर्तमान में कर्म की दार्शनिकता का महत्व समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में निष्काम कर्म की बात करना तो निश्चित रूप से फिजुल ही लगता है। सर्वहारा अधिनायकवाद ही लोगों के जीवन में कुछ जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी देता है। मेरी मान्यता है कि दुनिया में आवश्यकताएं सभी की पूरी होनी चाहिए परन्तु विलासिता किसी की भी पूरी नहीं होनी चाहिए। तभी दुनिया में सामाजिक न्याय का सपना साकार हो सकेगा। सामाजिक चेतना से ही सामाजिक नैतृत्व का उभार होता है। ऐसा उभार ही सामाजिक क्रांति को साकार करेगा।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

लोक हित की सुरक्षा के लिए मीडिया को अपनी एतिहासिक भूमिका में आना होगा - व्यास

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में राजनितिक लोगो का जितना योगदान रहा. उससे किसी भी मायने में कम योगदान समाचार पत्रों एवं पत्रिकओं का नहीं रहा था. चाहे हिंदुस्तान में नरम दल हो, चाहे या गरम दल दोनों ही विचारधाराओ की राजनीती को ताकत देने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.  आज भी मीडि़या पर लोक हितों की सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी आ पड़ी है। ऐसे में उसको लोकरूचि एवं लोकहितों के बीच लोकहितों को प्राथमिकता देते हुए विचार धाराओं का संचालन करना होगा। आज कार्पोंरेट मीडि़या एवं पबिलक मीडि़या के बीच खुला संघर्ष की सिथति उत्पन्न हो गर्इ है। आज जनता के हितों की सुरक्षा के लिए लोकमत तैयार करना आवश्यक हो गया है। क्यूंकि आज देश का आम व्यकित न केवल अशिक्षित हैं साथ ही वह उदासीन भी है। ऐसे हालातों में नागरिकों को मूल अधिकारों, मानवाधिकरों एवं कानूनीधिकारों की जानकारी देना मीडि़या की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।  आज हिन्दी भाषा में लाखों की संख्या में बिकने वाले बड़े अखबारों की जिम्मेदारी बनती है कि वह हिन्दी भाषी लोगों में दुनिया में बदलते हुए हालातों से हिन्दी भाषा में अवगत कराये। क्यूंकि दुनिया का ज्ञान, विज्ञान इतिहास सहित्य, कला का ज्ञान किसी एक भाषा का मोहताज नहीं होना चाहिये। पबिलक मीडि़या की जिम्मेदारी है कि वह ज्ञान विज्ञान एवं रोजगार की भाषा हिन्दी को बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करें। ताकि 60 करोड़ हिन्दी भाषी लोग दुनिया में प्रतिपल बदलते हालातों से नावाकिफ न रहें। ऐसे हालात में इलेक्ट्रोनिक मीडि़या को या प्रिन्ट मीडि़या या सोशल मीडि़या सभी को मिलकर लोकहितों की सुरक्षा के लिए स्वहित से ऊपर उठकर कार्य करना होगा। तभी मानव समाज अपने उच्च नैतिक मूल्यों को प्राप्त कर पायेगा। समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्यों के कारण ही भ्रष्टाचार, अनाचार एवं अन्यायपूर्ण व्यवस्था पल्लवित और पोषित हो रही है। ऐसे में लोकहितों की सुरक्षा करना प्रेस की भागीरथ भूमिका होगी।