मंगलवार, 11 मार्च 2014

आगामी लोकसभा चुनाव देश की दशा एवं दिशा तय करेंगे - व्यास

देशभर में 12 अप्रेल 2014 से 12 मई 2014 तक लोकसभा के एवं तीन राज्यों के विधानसभा के चुनाव होना निश्चित हुआ है। देश का 81 करोड़ से ज्यादा मतदाता आगामी चुनाव में मतदान करेगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश का 10 करोड़ से ज्यादा मतदाता वो है जो पहली बार मतदान करेगा। उसके मन में उठ रहे ज्यार भाटे को समझना प्रत्येक राजनीतिक दल एवं नेता के लिए चुनौतिपूर्ण कार्य है। चैखंभे राज की परिकल्पना रखने वाले डाॅ. राममनोहर लोहिया जी ने आजाद भारत में चैखंभा राज की मजबूती की कल्पना की थी। भारतीय लोकतंत्र में विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका एवं स्वतंत्र निर्भिक पत्रकारिता एवं प्रभावी जनसमूह की भी कल्पना की गई है। परन्तु आज विधायिका द्वारा बनाये गये कानून या तो बेअसर हो रहे है या लागू करने वाली एंजेसिया कानूनों को लागू करते समय अपनी इच्छा व इनिच्छा को ध्यान में रखके फैसले करती है। जिसके कारण जिन उद्देश्यों से कानून बनाये गये वो कानून उन उद्देश्यों को प्राप्ति नही कर पाता जिसके लिए उन्हे बनाया गया। आज भी कई लोकहित के कानून ठीक तरह से लागू नहीं हो पा रहे है। या जिन एंजेसियों को कानून लागू करने की जिम्मेदारी दी गई है वह सुविधा एवं असुविधा के आधार पर या व्यक्तिगत मान्यताओं से प्रभावी होकर कानूनों को निष्प्रभावी बना रहे है। कार्यपालिका या सरकार केवल वोट बैंक को कैसे लामबंद किया जा सकता है इसकों ध्यान में रखकर कानूनों का निर्माण एवं फैसले किये जा रहे है। सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में सरकारे वो निर्णय भी कर रही है जो विकास के बजाय विनाश के बीज तैयार कर रहे है। न्यायपालिका लोगों को न्याय नहीं दे रही है केवल निर्णय दे रही है। वो प्रत्येक निर्णय जरूरी नहीं है कि न्यायपूर्ण हो। 
 आज की आवश्यकता यह है कि निर्णय न्यायपूर्ण हो और कानूनों की सही व्याख्या करते हो। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष पत्रकारिता की उम्मीद आजादी के पहले की गई थी। परन्तु आज हिन्दुस्तान का मीडिया 81 हजार करोड़ का एक व्यापार बन कर रह गया है जिसमें हर निवेशक केवल आर्थिक लाभ ही ढ़ूंढता है। पत्रकारिता से संवेदनशीलता समाप्त होती जा रही है और नकारात्मक एवं पीत पत्रकारिता प्रभावी होती जा रही है। आज पेड न्यूज का व्यापार भी तेजी से फलता फूलता जा रहा है। भारतीय लोकतंत्र में पत्रकारिता काॅर्पोरेट इण्डिया का पेरोकार होती जा रहा है। जबकि उसे असली भारत के प्रति जवाबदेह, पारदर्शी होना चाहिए। आज आवश्यकता है समाज के शिक्षित और प्रशिक्षित जवाबदेह जनसमूह राजनीति, समाज व्यवस्था एवं सामाजिक ताने-बाने पर अपना नियंत्रण स्थापित करें अन्यथा देश में क्रांति हो या ना हो अराजकता तो हो ही सकती है। 
 जब तक समाज में नीति, नेता व नियत ठीक नहीं होगी तब तक आम आदमी के जीवन में कोई सूर्योदय नहीं हो पायेगा। आगामी चुनाव निश्चित रूप से नीति एवं नेता की अग्नि परीक्षा होगी कि वह जनहित में काम करते है या स्वहित में काम करते है। 

गुरुवार, 9 जनवरी 2014

आम आदमी के हितों की सुरक्षा केवल जन आन्दोलन से ही संभव है: व्यास

15 अगस्त 1947 को भारत अंग्रेजी शासन की दासता से मुक्त हुआ था। आजादी के आन्दोलन से पूर्व स्वतंत्रता सैनानियों का एक मात्र लक्ष्य था कि भारत को अंग्रेजी हितों की दासता से मुक्त कराकर स्वराज्य कायम करना। इसके लिए शहीद-ए-आजम भगतसिंह एवं उन्हीं के पात के गर्म दल के नेता एनकेन प्रकारेण देश को न केवल अंग्रेजों से आजादी दिलाना चाहते थे, बल्कि सही मायने में देश को आर्थिक, राजनैतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक व नागरिक आजादी भी दिलाने चाहते थे। इसके विपरित विचारधारा रखने वाले महात्मा गांधी एवं उनके अनुयायी भी देश को रामराज्य की कल्पना के आधार पर देश को खड़ा करने का सपना देखते थे।
कहा तो तय था चीराग हर घर-घर के लिए,
आज चीराग नहीं मयस्सर पूरे शहर के लिए,
    ठीक यह उक्ति आजाद भारत में सही साबित हुई। केवल भारत के नागरिकों को राजनीतिक आजादी हासिल हुई थी, परन्तु सामाजिक एवं राजनीतिक ढांचा हमें आज भी आजादी महसूस नहीं करने देता। डॉ. राममनोहर लोहिया एवं जयप्रकाश नारायण आजाद भारत के वो राजनीतिज्ञ थे, जिन्होंने देश के आम आदमी को न केवल सामाजिक न्याय दिलाने की लडाई शुरू की थी, बल्कि देश के आम आदमी को मुद्दों के आधार पर राजनीति करना सिखाया। 1967 में डॉ. लोहिया के नेतृत्व में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन व 1975 की इमरजेन्सी के बाद श्री जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में इंदिरा गांधी की तानाशाही से मुक्ति दिलाने के बाद जनता पार्टी का उदय 1988 के बाद श्री विश्वनाथ प्रतापसिंह के नेतृत्व में भ्रष्टाचार के विरूद्ध राजीव गांधी की 410 सीटों वाली सरकार को उखाड़ फैकने का श्रेय श्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को जाता है। श्री विश्वनाथ प्रतापसिंह ने रक्षा सौदों में दलाली जैसे मुद्धों को जनआन्दोलन का मुद्धा बनाया और आम आदमी को उदवेलित किया। जिसके परिणाम स्वरूप राजीव गांधी सरकार का पतन हुआ।
    अन्ना हजारे के नेतृत्व में 2011 में जनलोकपाल बिल को लेकर जो आन्दोलन हुआ। इस आन्दोलन को राजनीतिक दलों ने एवं नेताओं ने सिविल सोसायटी के लोगों के नाजायज हस्तक्षेप के रूप में लिया। सोसायटी के नेताओं ने बार-बार अन्ना हजारे, अरविन्द केजरीवाल व बाबा रामदेव को लल्कारा कि हम निर्वाचित प्रतिनिधि है, हमारे मामले में बेजाहस्तक्षेप संविधान विरूद्ध होगा। जन लोकपाल कानून बनाना है तो चुनाव लड़ के विधायका में आओं। अरविन्द केजरीवाल व साथियों ने इस चुनौति को स्वीकार किया और उन्होने माना कि बिना राजनीति में उतरे सरकारे तो बदली जा सकती है पर समाज में आमूलचूल परिवर्तन संभव नहीं है। आम आदमी पार्टी ने राजनीति को सामाजिक परिवर्तन के औजार के रूप में इस्तेमाल करने का निर्णय लिया जिसके परिणाम स्वरूप पिछले एक साल में आम आदमी के हक में एवं उसकी सुरक्षा के लिए जो आन्दोलन हुए उसके परिणाम स्वरूप आज दिल्ली में सरकार आम आदमी की बनी है बल्कि अब पूरे हिन्दुस्तान की राजनीति का एजेन्डा आम आदमी पार्टी तय कर रही है। आम आदमी के हित में जो जन आन्दोलन चला महंगाई, भ्रष्टाचार, भाई-भतिजावाद, सरकारी साधनों का अपव्यय एवं दुरविनियोग जैसे मामले रहे आज पूरे हिन्दुस्तान में सादगी एवं पारदर्शिता जवाबदेही ने जनता के मन को न केवल उदवेलित किया है बल्कि आम आदमी के हितों की सुरक्षा करने वाली सरकार की कल्पना भी देश में वो कर रहे है। इस प्रकार केवल जन आन्दोलन से ही आम आदमी के हालात में आमूलचूल परिवर्तन संभव है।

मंगलवार, 1 अक्टूबर 2013

विधि संसद ही नहीं बनाती है बल्कि प्रकति एवं ईश्वर भी बनाते है. व्यास

विधि शब्द अपने आप में ही विधाता से जुड़ा हुआ शब्द लगता है। आध्यात्मिक जगत में विधि के विधान का आशय विधाता द्वारा बनाये हुए कानून से है। जीवन एवं मृत्यु विधाता के द्वारा बनाया हुआ कानून है या विधि का ही विधान कह सकते है। सामान्य रूप से विधाता का कानून, प्रकृति का कानून, जीव-जगत का कानून एवं समाज का कानून। आज कानून का अर्थ या विधि का अर्थ राज्य द्वारा निर्मित विधि से आज पूरी दुनिया प्रभावित हो रही है। राजनीति आज समाज का अनिवार्य अंग हो गया है। समाज का प्रत्येक जीव कानूनो द्वारा संचालित है। प्रकृति का भी अपना विधान है। प्रकृति अपने ही विधान से संचालित होती है। जल, वायु, आकाश, पृथ्वी और अग्नि भी प्रकृति के विधान से ही संचालित होती है। हजारो सालो से ये पांचो तत्व प्रकृति के विधान से ही संचालित होते है। भारतीय समाज में प्रत्येक जीव को इन पंचतत्वों का पूतला ही माना जाता है। जीवन से अंत तक प्रत्येक जीव इन्ही में ही जीते है और मरते हे। प्रकृति के साथ मनुष्य ने प्रकृति का विधान न जानने के कारण संघर्ष भी किया था।
परन्तु जैसे-जैसे मनुष्य जाति में प्रकृति के विधानोको समझना शुरू किया वैसे-वैसे उसने संघर्ष करने की बजाय समन्वय करना शुरू कर दिया। उसी का परिणाम है कि मनुष्य ने प्रकृति में जो शक्तिया है उसका इस्तेमाल अपने फायदे के लिये भी किया है। पर समाज के कुछ लोगों ने प्रकृति के विधान का रहस्य खोजने के बाद दुरूपयोग भी किया है। परमाणु से परमाणु बंब भी बनाया जा सकता है और परमाणु से अथाह उर्जा भी पैदा की जा सकती है। मनुष्य जाति के कुछ लोगों ने लोभ और लालच के कारण प्रकृति के साधनो का निर्मम दोहन किया जिसके परिणाम स्वरूप प्रकृति ने भी अपने विधान के अनुसार मनुष्य जाति को ही नही दूसरे जीवो को भी अपनी प्रतिक्रिया से प्रभावित किया है। भूकंप, बाढ़, तूफान, ज्वालामुखी ये सब प्रकृति के विधान को न मानने के कारण ही प्रकृति का विद्रोह है।
आज समाज में भी विधि के शासन के नाम पर दुनिया भर में सरकारे नागरिको के लिये विधि का निर्माण करती है। विधि का उदेश्य समाज के आचरण को नियमित करना है। अधिकार एवं दायित्वों के लिये स्पष्ट व्याख्या करना भी है साथ ही समाज में हो रहे अनैकतिक कार्य या लोकनीति के विरूद्ध होने वाले कार्यो को अपराध घोषित करके अपराधियों में भय पैदा करना भी अपराध विधि का उदेश्य है।संयुक्त राष्ट्र संघ ने 1945 से लेकर आज तक अपने चार्टर के माध्यम से या अपने विभिन्न अनुसांगिक संगठनो के माध्यम से दुनिया के राज्यो को व नागरिको को यह बताने का प्रयास किया कि बिना शांति के समाज का विकास संभव नहीं है परन्तु शांति के लिये सहअस्तित्व एवं न्यायपूर्ण दृष्टिकोण ही नहीं आचरण को जिंदा करना भी जरूरी है। न्यायपूर्ण आचरण न होने के कारण ही आज समाज में अन्याय को ही न्याय मान लिया गया है। आज वक्त आ गया है न्यायपूर्ण समाज की रचना के लिये केवल विचार ही व्यक्त ना करे बल्कि न्यायपूर्ण आचरण भी करे तभी दुनिया में न्यायपूर्ण समाज की रचना संभव हो पायेगी। न्यायपूर्ण समाज में ही शांति, सदभाव, मैत्री, सहअस्तित्व कायम हो पाता है।

शुक्रवार, 27 सितंबर 2013

देश की विधायिका क्या अपराधियों से मुक्त होने के लिए तैयार है ?-व्यास

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भारत सरकार आज देश की संसद में बैठे 162 दागी व्यक्तियों एवं देश की विभिन्न विधानसभाओं में बैठे 3000 हजार से ज्यादा दागी विधायिकों को ऐन-केन प्रकारेण चुनाव लड़ने के अधिकारों से वंचित नहीं करना चाहती है। सरकार ने आनन-फानन में अध्यादेश का मसोदा तैयार किया और केबिनेट से स्वीकृति हेतु पे्रषित किया परन्तु देश के विवेकशील, निःष्पक्ष एवं प्रतिभावान राष्ट्रपति महोदय से सरकार से जानना चाहा कि ‘‘वह क्यूं जल्दबाजी में जरिया अध्यादेश अपराधियों को बचाने पर आमदा है। क्यों कि देश के उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में स्पष्ट उल्लेख किया कि जिस जन प्रतिनिधि को किसी भी अदालत में 2 वर्ष से ज्यादा कारावास की सजा सुना दी है, वह व्यक्ति तत्काल प्रभाव से चुनाव लड़ने के लिये अयोग्य हो जायेगा और अपील कर देने के बाद भी उसको अयोग्यता से नहीं बताया जा सकेगा। देश की संसद में बैठे कुछ लोग किसी भी कीमत पर विधायिका को शायद अपराध मुक्त नहीं देखना चाहते है। भारत सरकार भी इस कृत्य के लिए कोई कम जिम्मेदार नहीं है। आज ही उच्चतम न्यायालय ने अपने फैसले में राईट टू रिजेक्ट को मतदाता का महत्वपूर्ण अधिकार के रूप में मान्यता दी है। परन्तु देश के राजनैतिक दल, नेता किसी भी कीमत पर चुनाव सुधारों को लागु करने के प्रति ईमानदार नहीं है। देश की आम जनता हो ही तय करना है कि वे राईट टू रिजेक्ट जैसे ब्रह्यास्त्र का इस्तेमाल करते हुए अपराधी उम्मीदवारों को बहुमत से रिजेक्ट करें। मेरी मान्यता यह है कि 16.33 प्रतिशत वेध मतों का यदि राईट टू रिजेक्ट के पक्ष में वोट पड़ते है तो राईट टू रिजेक्ट जैसे मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए आवश्यका होने पर जनमत संग्रह भी करना चाहिए। आज पुरी दुनिया में पूंजीवादी, निरंकुश अर्थव्यवस्था ने दुनिया के आम आदमी का जीवन को नरक बना दिया है। आज व्यक्ति व्यक्तिवादी हो गया है जो केवल अपने हितों को ही सुरक्षित करने पर आमदा है। केवल व्यवस्था परिवर्तन से ही सामाजिक हितों की सुरक्षा संभव है। आज सामाजिक हितों की सुरक्षा की बात करना नितांत मूर्खतापूर्ण कार्य माना जाता है। वर्तमान में कर्म की दार्शनिकता का महत्व समाप्त होता जा रहा है। ऐसे में निष्काम कर्म की बात करना तो निश्चित रूप से फिजुल ही लगता है। सर्वहारा अधिनायकवाद ही लोगों के जीवन में कुछ जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति की गारंटी देता है। मेरी मान्यता है कि दुनिया में आवश्यकताएं सभी की पूरी होनी चाहिए परन्तु विलासिता किसी की भी पूरी नहीं होनी चाहिए। तभी दुनिया में सामाजिक न्याय का सपना साकार हो सकेगा। सामाजिक चेतना से ही सामाजिक नैतृत्व का उभार होता है। ऐसा उभार ही सामाजिक क्रांति को साकार करेगा।

गुरुवार, 1 अगस्त 2013

लोक हित की सुरक्षा के लिए मीडिया को अपनी एतिहासिक भूमिका में आना होगा - व्यास

भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के इतिहास में राजनितिक लोगो का जितना योगदान रहा. उससे किसी भी मायने में कम योगदान समाचार पत्रों एवं पत्रिकओं का नहीं रहा था. चाहे हिंदुस्तान में नरम दल हो, चाहे या गरम दल दोनों ही विचारधाराओ की राजनीती को ताकत देने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही थी.  आज भी मीडि़या पर लोक हितों की सुरक्षा की अहम जिम्मेदारी आ पड़ी है। ऐसे में उसको लोकरूचि एवं लोकहितों के बीच लोकहितों को प्राथमिकता देते हुए विचार धाराओं का संचालन करना होगा। आज कार्पोंरेट मीडि़या एवं पबिलक मीडि़या के बीच खुला संघर्ष की सिथति उत्पन्न हो गर्इ है। आज जनता के हितों की सुरक्षा के लिए लोकमत तैयार करना आवश्यक हो गया है। क्यूंकि आज देश का आम व्यकित न केवल अशिक्षित हैं साथ ही वह उदासीन भी है। ऐसे हालातों में नागरिकों को मूल अधिकारों, मानवाधिकरों एवं कानूनीधिकारों की जानकारी देना मीडि़या की महत्वपूर्ण भूमिका होगी।  आज हिन्दी भाषा में लाखों की संख्या में बिकने वाले बड़े अखबारों की जिम्मेदारी बनती है कि वह हिन्दी भाषी लोगों में दुनिया में बदलते हुए हालातों से हिन्दी भाषा में अवगत कराये। क्यूंकि दुनिया का ज्ञान, विज्ञान इतिहास सहित्य, कला का ज्ञान किसी एक भाषा का मोहताज नहीं होना चाहिये। पबिलक मीडि़या की जिम्मेदारी है कि वह ज्ञान विज्ञान एवं रोजगार की भाषा हिन्दी को बनाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निर्वाह करें। ताकि 60 करोड़ हिन्दी भाषी लोग दुनिया में प्रतिपल बदलते हालातों से नावाकिफ न रहें। ऐसे हालात में इलेक्ट्रोनिक मीडि़या को या प्रिन्ट मीडि़या या सोशल मीडि़या सभी को मिलकर लोकहितों की सुरक्षा के लिए स्वहित से ऊपर उठकर कार्य करना होगा। तभी मानव समाज अपने उच्च नैतिक मूल्यों को प्राप्त कर पायेगा। समाज में गिरते हुए नैतिक मूल्यों के कारण ही भ्रष्टाचार, अनाचार एवं अन्यायपूर्ण व्यवस्था पल्लवित और पोषित हो रही है। ऐसे में लोकहितों की सुरक्षा करना प्रेस की भागीरथ भूमिका होगी।


मंगलवार, 14 मई 2013

कागजो में मानवाधिकार बहाल, पर जमीन पे बेहाल - व्यास


     1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ का गठन हुआ। संयुक्त राष्ट्र संघ राज्यो का संघ है अर्थात सरकारे ही इसकी सदस्य होती है न कि नागरिक। आज दुनिया के सात अरब नागरिक अपने  मानवाधिकारों की बहाली के लिये निरन्तर संघर्ष कर रहे है परन्तु उन्हे मानवाधिकार हासिल करने में भीषण संघर्ष करना पड रहा है। यू तो कागजो में अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, तीस सूत्रीय अन्तर्राष्ट्रीय मानवाधिकार घोषणा, अन्तर्राष्ट्रीय अपराध न्यायालय, सुरक्षा परिषद, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक परिषद मोजुद है। समय-समय पर अन्तर्राष्ट्रीय घोषणाओं के माध्यम से भी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर मानवाधिकारों की बहाली के संकल्प पारित किये जाते है परन्तु भारत जेसे देश में भी भारत के संविधान मे नागरिको के मूल अधिकारों के माध्यम से मानवाधिकारो को मान्यता प्रदान की गयी है। साथ ही नीति निर्देशक तत्वो के माध्यम से सरकारो पर दायित्व दिया गया की वे नागरिको के सर्वांगीण विकास के लिये उचित कानून, सुविधाए एवं वातावरण तेयार करे। परन्तु 1947 से आज दिनांक तक देश के नागरिको को शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, न्याय, आवास, पेयजल, पर्यावरण एवं जीवन को सम्मान के साथ जीने के लिये जो सुविधाए चाहिए वो आज भी 80 प्रतिशत लोगो तक नहीं पहुच पायी है। आज भी भारत में अनिवार्य शिक्षा कानून (निःशुल्क 2005) बन जाने के बावजुद भी 6-14 साल के बच्चे इस कानून का लाभ नही उठा पा रहे है क्योंकि अन्तर्राष्ट्रीय संधियो पर हस्ताक्षर करके सरकार चाहे अपने कर्तव्यो की इतिश्री करले दुनिया का जनमत नाराज न हो जाये इस लिहाज से आवश्यकतानुसार मानवाधिकारो से वंचित लोगो के लिये आवश्यक कानून भी बना दे तब भी नियत साफ न हो या आपको जिस कार्य को नहीं करने की इच्छा है वो कार्य आप कतई नही करेंगे। आज वो ही हाल भारत में स्पष्ट दिख रहा है। मानवाधिकार की धारा 30 के अनुसार देश भर में जिला एवं सत्र न्यायालयो को विशिष्ट मानवाधिकार न्यायालय घोषित करना था परन्तु सरकारो ने आज दिनांक तक क्यो नही घोषित किया ये मै नहीं समझ पा रहा हू। दूसरा सवाल यह है कि आज दिनांक तक राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वार्षिक प्रतिवेदनो एवं अनुसंशाओं के अनुरूप भारत सरकार ने क्या-क्या कार्य किये इसकी पालना रिपोर्ट न केवल संसद के पटल पर रखी जानी चाहिए बल्कि ऐसी पालना रिपोर्ट को मानव संसाधन मंत्रालय को अपनी वेबसाईट पर भी डालना चाहिए था परन्तु कार्यो के प्रति कमजोर निष्ठा ने ऐसा नही होने दिया। आज एक फेशन हो गया है कि नागरिको को कर्तव्य पालन के लिये कहा जाता है पर भारत के संविधान में नीति निर्देशक तत्व के अन्दर राज्य के कर्तव्य भी बताये गये है। जब राज्य अपने कर्तव्यों की पालना करते हुए देश के खजाने का एकन्-एक रूपये का लोककल्याण के लिये इस्तेमाल न करे तो वह किस मुह से नागरिको से उम्मीद करते है कि उन्हें संविधान के नागरिक कर्तव्यो का पालन करना चाहिए। आज कार्यपालिका, न्यायपालिका, विधायिका एवं लोकसंगठनो की जवाबदेही क्या देश के नागरिाके के प्रति नही है यदि है तो इन्हें जवाबदेही, पारदर्शिता एवं सुशासन के नियमों की पालना करते हुए नागरिको को उपरोक्त मुदो पर किये कार्यो का ईमानदारी से शपथपुर्वक कार्य विवरण पेश करना चाहिए ताकि जनता खुद आकलन करेगी। उपर बतायी गयी संस्थाए कितनी जवाबदेह है एवं कितनी पारदर्शी है।


गुरुवार, 14 मार्च 2013

दुनिया के उपभोक्ता एक हो - भूख, भय व भ्रष्टाचार के खिलाफ - व्यास


     15 मार्च को पूरी दूनिया में उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है। इसका मतलब यह है कि दुनिया का उपभोक्ता आज भी अपने मूलभूत अधिकारों से वंचित है। मसलन जानने का अधिकार है। आज भी उपभोक्ता जिन वस्तु एवं सेवाओं का इस्तेमाल करता है परंतु खरीदने से पहले उसको खरीदी जाने वाली वस्तु और सेवाओं के बारे में पर्याप्त एवं सही सुलभ जानकारी उपभोक्ता की भाषा में नहीं होती जिसके कारण उपभोक्ता को वस्तु एवं सेवाओं से न केवल ठगी का शिकार होना पड़ता है साथ ही उसे गुणवता हीन एवं स्तरहीन एवं नुकसान दायक वस्तुओं और सेवाओं से ही काम चलाना पड़ता है। आज भी भारत के अंदर उपभोक्ता को वस्तु एवं सेवाओं के लागत मूल्य जानने का अधिकार प्राप्त नहीं हुआ है केवल अधिकतम खुदरा मूल्य छपवाकर सरकारे अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेती हे पर वास्तविकता की हम छानबीन करे तो हम पायेगे की इसके पिछे भी बहुत बडे घोटाले छीपे हुए है जो उपभोक्ताओ को जानबुझकर लागत मूल्य जानने का अधिकार नही दिला रहे हे क्योकि उद्योग, वाणिज्य व सेवा क्षेत्र कभी नहीं चाहेगा कि उसके उपभोक्ता को उसकी वस्तु ओर सेवाओं का लागत मूल्य पता चल जाए। ऐसी स्थिति में उपभोक्ता को लागत मूल्य जानने का अधिकार बहाल नहीं हो जाता तब तक सरकारो द्वारा उपभोक्ता संरक्षण व सुरक्षा की बाते करना केवल उपभोक्ताओं को धोखें मे डालने वाली बात है।
    खाद्य अपमिश्रण कानून, ओषधि नियंत्रण कानून, आवश्यक वस्तु अधिनियम, पैकेज एक्ट एवं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के अलावा भी सेकडो कानून ऐसे हे जो उपभोक्ताओ को त्वरित, सुलभ एवं सस्ता न्याय देने की बात करते हे परंतु आज भी उपभोक्ता जिला मंचो से लेकर सुर्पीम कोर्ट तक जीतने के बावजूद भी अपने आप को हारा हुआ ही महसूस करता है और हारा हुआ उपभोक्ता तो खुद ही अपने आप को गोर निराशा के खडे में गिरा हुआ महसूस करता है। सरकारो ने कथाकथित जिला मंच एवं जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषदो का राजनीतिकरण किया है जिसके परिणाम स्वरूप उपभोक्ताओ को न ही प्रशासनिक स्तर और न ही न्यायिक स्तर पर सही न्याय मिल पा रहा है। केवल कानून बना देने से उपभोक्ता को न्याय नही मिलेगा इसके लिये सरकारो, न्यायपालिका, मीडिया, उपभोक्ता जन संगठनो को संवेदनशील एवं सतर्क रहते हुए उपभोक्ताओं के हको को लागू कराने के लिए काम करना होगा। आज अंबेडकर जी की वह पंक्तियां याद आती है - शिक्षित बनो, संगठित रहो एवं संधर्ष करो। उपभोक्ता यदि इन पंक्तियों का आचरण का हिस्सा बना ले तो शायद सात अरब उपभोक्ताओ के जीवन में नयी क्रांति हो सकती । न ही तो यू ही हर 15 मार्च को हम अन्तर्राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाते रहेंगे।